रोग से मुक्ति की चाह में बीमारी बटोर रहे रोगी और परिजन
गोण्डा। वार्डों में फैली गन्दगी पर तो कभी कभार झाड़ू लग भी जाता है लेकिन अस्पताल से निकालने वाली नालियाँ और वार्डों के छज्जो पर जमा भारी गन्दगी पर न तो अस्पताल प्रशासन की दृष्टि पडती है और न ही सफाई कर्मियों की, कुछ इसी तरह मेडिकल कालेज की सफाई व्यवस्था की पोल बरसात के बाद भी बने जलजमाव और बजबजाती नालियाँ भी खोल रही हैं।

बरसात की विदाई और सर्दी की भी समाप्ति हो रही है लेकिन ज़िला अस्पताल से मेडिकल कालेज में परिवर्तित हो चुके बाबू ईश्वरशरण ज़िला चिकित्सालय की बदहाल सफाई व्यवस्था सुधरने का नाम नहीं ले रही, नेत्र विभाग के पास से निकालने वाली नाली हो या होम्योपैथी चिकित्सालय की बगल के रास्ते का जलजमाव,

जिन पर शायद ही कभी सफाईकर्मियों ने ध्यान दिया हो इसी तरह मेडिकल वार्ड के छत पर निकले छज्जे की बात की जाये तो छज्जो पर गंदगी और कूड़े के ढेर को आसानी से देखकर ये समझा जा सकता है की शायद ही कभी इन जगहों की सफाई की गईं है।

यही नहीं यदि बात की जाये ज़िला अस्पताल के प्रथम तल पर बने मेडिकल वार्ड के बरामदे को तो उसे कबाड़ खाने में बदल कर गंदगी और कूड़े को एकत्र करने का स्थान बना दिया गया है, खास बात तो ये है की इसी कबाड़ के बीच वार्डों में मरीजों और चिकित्साकर्मियों के बीच घूमते आवारा कुत्तों द्वारा विसर्जित किये गए मल को भी सफाईकर्मियों द्वारा एकत्र कर डाल दिया जाता है

जबकि सर्दी ही नहीं बल्कि हर मौसम में रोगियों के परिजन इसी कबाड़खाने और कुत्तों के एकत्र मल के पास बैठते उठते हैं जो कभी भी किसी गंभीर संक्रामक रोग की चपेट में आ सकते हैं।
