मध्य प्रदेश लाइफस्टाइल

‘गली बचपन की’ विषय पर राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में जुटे देशभर के बाल रचनाकार

Written by Vaarta Desk

हमें बाल मन को पढ़ने की बहुत ज्यादा जरूरत

साहित्य अकादमी मप्र के महती आयोजन में साहित्यकार व
शोधार्थियों ने बताए समस्याओं के समाधान

समापन सत्र में निदेशक डॉ. दवे की भावना पर भावुक हुए रचनाकार

भोपाल (मप्र)। हमें वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बच्चों तक पहुंचाने के तरीकों पर विचार करना होगा।रचनात्मकता के साथ शालाओं में स्मारिका प्रकाशन की तरफ भी और ध्यान देना चाहिए। वैश्वीकरण के दौर में भारतीय बाल साहित्य की वैश्विक पहचान और अनुवाद की संभावनाएँ बहुत बढ़ गई हैं। अनुवाद पुल है। बाजारीकरण और मानवीय मूल्यों की सुरक्षा पर जोर देना पड़ेगा। अपने मन में, अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की बहुत ज्यादा जरूरत है। अगर हमें उनके साथ चलना है, उनके लिए कुछ लिखना है तो वैसा ही पढ़ना भी पड़ेगा, वैसा सोचना भी पड़ेगा और ऐसा बनना भी पड़ेगा। हमें बाल मन को पढ़ने की बहुत ज्यादा जरूरत है।

यह विचार विभिन्न वक्ताओं के उद्बोधन का वह सार है, जो उन्होंने भोपाल में बाल साहित्यकार स्व. कृष्ण कुमार अष्ठाना (सम्पादक- देवपुत्र) की स्मृति में ‘गली बचपन की’ विषय पर साहित्य अकादमी मप्र द्वारा आयोजित 2 दिवसीय राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में दूसरे दिन के विभिन्न सत्र में व्यक्त किए। अकादमी ने यह बेहद महत्वपूर्ण कार्यक्रम स्मार्ट रोड स्थित एनआईटीटीटीआर परिसर (श्यामला हिल्स) में आयोजित किया, जिसमें विभिन्न राज्यों से बाल साहित्यकार, शोधार्थी तथा साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए और नन्हे-मुन्नों के बदलते परिवेश में बाल साहित्य की भूमिका पर गंभीर विचार-विमर्श करते हुए विभिन्न समस्याओं के समाधान भी प्रस्तुत किए। अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे की उपस्थिति में दूसरे दिन इस संगोष्ठी का समग्र संयोजन ‘देवपुत्र’ के संपादक गोपाल माहेश्वरी ने किया।
शाम को साढ़े 5.30 बजे समापन सत्र में विदाई भाव निदेशक डॉ. दवे ने व्यक्त किया। इनकी मन की बात सुनकर अनेक रचनाकार विदाई के पल में बड़े भावुक हो गए। आपने डॉ. जीवन रजक (विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, मंत्री संस्कृति) के सम्बोधन एवं उपस्थिति के लिए विशेष आभार व्यक्त किया। समग्र वृत्त की जिम्मेदारी बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने निभाई।

विभिन्न बिन्दुओं पर किया चिंतन

इस संगोष्ठी में दूसरे दिन ‘बाल-साहित्य में बदलती परिवार व्यवस्था, शिक्षक एवं समाज की भूमिका’ विषय पर डॉ.रेखा लोढ़ा ‘स्मित’, नीलम राकेश, डॉ. उमेशचंद्र सिरसवारी, दिनेश पाठक ‘शशि’ आदि ने अपनी बात रखी, तो वरिष्ठ लघुकथाकार मीरा जैन (उज्जैन) ने भी अपना वक्तव्यीय योगदान दिया। इसी कड़ी में ‘बाल-साहित्य में कल्पना एवं यथार्थ’ विषय पर डॉ.आर.पी. सारस्वत, डॉ. वर्षा ढोबले, शिवचरण चौहान, शरद शबल और रेनू सैनी आदि रचनाकारों ने अपने भाव व्यक्त किए। ‘बाल-साहित्य में पठन की चुनौती : तकनीक की बदलती प्रवृत्तियां, आडियो-वीडियो और बाल फिल्में-धारावाहिक’ विषय पर सुषमा व्यास, रजनीकांत शुक्ल, इन्दु पाराशर और प्रगति मिमरोट ने विभिन्न बिंदुओं कों चिंतन के रूप में सामने रखा, जबकि बीज वक्तव्य भाषाविद और साहित्यकार डॉ. पूजा अलापुरिया ‘हेमाक्ष'(मुम्बई) ने देते हुए कहा, कि आज बच्चों की बहुत सारी चीजें बदल गई है। आज वह हमारी तरह से नहीं सोचते हैं। हम अपडेटेड नहीं हैं। हमें अपडेटेड होने के लिए बच्चों से बात करनी पड़ेगी। अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की बहुत ज्यादा जरूरत है। अगर हमें उनके साथ चलना है, उनके लिए अगर कुछ लिखना है तो वैसा ही पढ़ना भी पड़ेगा, वैसा सोचना भी पड़ेगा और ऐसा बनना भी पड़ेगा।
ऐसे ही ‘बाल-साहित्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव तथा डिजीटल युग में बाल-साहित्य की चुनौतियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव’ विषय पर डॉ. पूनम अग्रवाल, सुषमा सिंह, वंदना यादव, डॉ. विमला भंडारी एवं मुकेश तिवारी (इंदौर) आदि ने भी अपने विचारों की बानगी दिखाई।

71 वक्ताओं ने दी मंचीय अभिव्यक्ति
14 मार्च को दूसरे दिन अलग-अलग सत्र में ‘बाल साहित्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव तथा डिजिटल युग में बाल साहित्य की चुनौतियाँ और एआई का प्रभाव’, ‘बाल अवस्था के रचनाकारों की बाल साहित्य सृजन में भूमिका’ आदि विषयों पर कुल 5 सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों की पूर्णतः सक्रिय सहभागिता रही। संगोष्ठी में कुल 11 सत्र हुए, जिनमें 10 मुख्य विषयों पर गहन विमर्श करते हुए 51 वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए, साथ ही 21 अध्यक्षों और बीज वक्ताओं सहित कुल 71 वक्ताओं ने मंच से अपनी अभिव्यक्ति दी। आयोजन में लेखक अजय जैन ‘विकल्प’ का विशेष सहयोग रहा।

शोधार्थियों का विशेष सत्र
आयोजन की एक विशेषता के रूप में एक सत्र बाल साहित्य के पीएचडी शोधार्थियों के लिए विशेष विमर्श का भी रहा। निदेशक डॉ. दवे ने इसमें बाल साहित्य पर पीएचडी करने वाले शोधार्थियों और उनके गाइड डॉ. पूजा अलापुरिया आदि से चर्चा की। इसमें शोधपरक आयामों पर चर्चा से समझा गया कि बाल साहित्य पर और कैसे विषयों पर शोध की आवश्यकता है एवं इसे बढ़ाया जाए।

मंच से 20 पुस्तक विमोचित

इस महती आयोजन में विभिन्न राज्य के साहित्यकारों की बाल साहित्य की 20 पुस्तक एवं 1 मासिक पत्रिका का लोकार्पण होना भी अपने-आपमें कीर्तिमान है। रचनाकार डॉ. मीनाक्षी दुबे की पुस्तक ‘नाम नौनिहालों के:पाती वीर सपूतों की’, किशोर श्रीवास्तव पुस्तक ‘विश्वास की रक्षा’, ‘मेहनत का फल’ और ‘खुशियों की वापसी’ का विमोचन अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने मंच पर किया, वहीं डॉ.भैरूँलाल गर्ग की पुस्तक ‘चलो चलें नानी के गाँव‘, समीक्षा तैलंग की पुस्तक ‘बेड़ा गर्क है’, शिवम सिंह की पुस्तक ‘नन्हे मुन्ने गीत’, डॉ. सुधा गुप्ता ‘अमृता’ की 2 पुस्तक ‘बुंदेली संस्कृति के रंग’-छई छपाक छपर छपर’, सुषमा सिंह की 2 पुस्तक ‘नन्हा पाखी’-‘कच्चा पापड़’ एवं माधुरी व्यास ‘नवपमा’ की पुस्तक ‘अनुभूति’ का लोकार्पण यहाँ किया गया। डॉ. मंजरी शुक्ला की पुस्तक ‘उड़ चले जादुई बर्तन’, नीलम राकेश की पुस्तक ‘सतरंगी दुनिया’ व द ‘रैनबो वर्ल्ड’, प्रो. प्रभा पंत की पुस्तक ‘मुझको सूरज बनना है’, ‘डिबिया में बंद चींटी व ‘मेरी प्रिय बाल कहानियाँ’, डॉ. अशोक व्यास की पुस्तक ‘स्वप्न भंग का अनवरत सिलसिला’ आदि सहित मासिक पत्र ‘राष्ट्र समर्पण’ के अंक का लोकार्पण निदेशक ने किया।

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