उत्तर प्रदेश गोंडा स्वास्थ्य

विश्व स्तनपान दिवस: पहले घंटे में स्तनपान की उपलब्धि, अब 6 माह तक केवल मां के दूध पर जोर

देवीपाटन मंडल के 3.18 लाख से अधिक नवजातों को मिला पहला प्राकृतिक टीका

स्वास्थ्य विभाग अब 6 माह के पूर्ण स्तनपान के लिए चला रहा जागरूकता अभियान

गोंडा। विश्व स्तनपान दिवस (1 अगस्त) के अवसर पर स्वास्थ्य विभाग जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने की बड़ी उपलब्धि का जश्न मना रहा है। अब विभाग का अगला लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक शिशु को जन्म के बाद शुरुआती छह माह तक केवल मां का दूध ही मिले।

देवीपाटन मंडल में बीते वित्तीय वर्ष के दौरान कुल 32,6040 जीवित शिशुओं का जन्म हुआ, जिनमें से 3,18,603 नवजातों को जन्म के पहले एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया गया। यह उपलब्धि दर्शाती है कि स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव के तुरंत बाद स्तनपान शुरू कराने की व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू हो चुकी है।

आंकड़ों में देवीपाटन मंडल की उपलब्धि-
मंडल स्तर पर गोंडा में 105212, बहराइच में 98,959, बलरामपुर में 74,622 तथा श्रावस्ती में 39,810 नवजातों को जन्म के पहले घंटे के भीतर मां का दूध उपलब्ध कराया गया।

नवजात के लिए ‘प्राकृतिक वैक्सीन’ है कोलोस्ट्रम-
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार जन्म के तुरंत बाद निकलने वाला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है, नवजात के लिए पहली प्राकृतिक वैक्सीन की तरह काम करता है। इसमें मौजूद एंटीबॉडीज और लैक्टोफेरिन जैसे प्रतिरक्षात्मक तत्व शिशु को शुरुआती संक्रमणों से बचाते हैं और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बीमारियों से सुरक्षा और सर्वांगीण विकास-
गोंडा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संतलाल पटेल ने बताया कि जन्म के बाद पहले छह माह तक शिशु को केवल मां का दूध ही दिया जाना चाहिए। इस दौरान पानी, शहद, घुट्टी, गाय या भैंस का दूध अथवा कोई अन्य पूरक आहार देने की आवश्यकता नहीं होती। मां का दूध शिशु की सभी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करता है और दस्त, निमोनिया तथा कुपोषण जैसी गंभीर समस्याओं के खतरे को कम करने के साथ उसके मानसिक एवं शारीरिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

सुरक्षित प्रसव के साथ सुरक्षित शुरुआत-
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के मंडलीय प्रबंधक राहुल पटेल ने बताया कि स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव के तुरंत बाद स्तनपान शुरू कराने के लिए स्टाफ को प्रशिक्षित किया गया है। वहीं, एचबीएनसी भ्रमण के दौरान आशा कार्यकर्ता परिवारों को पहले छह माह तक केवल स्तनपान और सही स्तनपान की तकनीक के बारे में जागरूक करती हैं।

सामाजिक भ्रांतियाँ हो रहीं दूर-
अपर निदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, देवीपाटन मंडल डॉ. अल्पना रानी गुप्ता ने बताया कि पहले परिवारों में यह धारणा थी कि प्रसव के बाद कई दिनों तक मां का दूध नहीं आता, इसलिए शिशु को शहद या घुट्टी दी जाती थी। अस्पतालों में प्रसव के तुरंत बाद स्तनपान शुरू कराने और नियमित परामर्श से ऐसी भ्रांतियां तेजी से समाप्त हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अब स्वास्थ्य विभाग का मुख्य फोकस यह सुनिश्चित करना है कि कामकाजी माताएं भी पहले छह माह तक केवल मां का दूध ही शिशु को उपलब्ध करा सकें। इसके लिए सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के कंगारू मदर केयर (केएमसी) वार्डों में माताओं को सही स्तनपान तकनीक और आवश्यकता पड़ने पर दूध निकालकर सुरक्षित तरीके से पिलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

जागरूकता का दिख रहा असर-
स्वास्थ्य केंद्रों और सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए स्तनपान संबंधी संदेशों का सकारात्मक प्रभाव परिवारों की सोच में दिखाई देने लगा है। बहराइच के बालकपुरवा निवासी देवी दयाल बताते हैं कि पहले बच्चे के जन्म के समय अस्पताल की दीवार पर लिखे संदेश पढ़कर उनकी सोच बदली। जब उनकी पत्नी ने दूध न आने की बात कही तो उन्होंने धैर्य रखते हुए स्तनपान जारी रखने के लिए प्रेरित किया। कुछ ही समय में दूध का स्राव सामान्य हो गया और परिवार की वर्षों पुरानी भ्रांति भी दूर हो गई।

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राजेंद्र सिंह

राजेंद्र सिंह (सम्पादक)

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