कल देश के विभिन्न प्रदेशों में बकरीद की नमाज़ के दृश्यों ने देश मे राजनीतिक धरातल के एक बहुत बड़े अंतर को उजागर कर दिया।
राजस्थान और मध्य प्रदेश में—जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पृष्ठभूमि वाले नए मुख्यमंत्रियों को पर्ची निकाल कर नियुक्त किया गया है , यहां पर सार्वजनिक सड़कों पर नमाज़ न होने देने के सरकारी विज्ञापनों की धरातल पर धज्जियां उड़ गईं।
राजस्थान के जयपुर ईदगाह के बाहर लगभग एक लाख नमाज़ियों की भारी भीड़ मुख्य मार्ग पर आ गई, जिसके कारण दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-48) जैसा देश का प्रमुख राजमार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो गया और यातायात व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।
ऐसा ही दृश्य मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में भी देखने को मिला, जहाँ स्थानीय पुलिस मूकदर्शक बनी रही और सार्वजनिक मार्गों तथा चौराहों पर नमाजियों और मेलों का कब्ज़ा रहा।
वैचारिक रूप से कठोर दिखने वाली RSS की पृष्ठभूमि वाली सरकार प्रमुखों का रुख वास्तविक संकट के समय अत्यंत ढुलमुल और शिथिल सिद्ध हुआ।
इसके विपरीत उत्तर प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल में दृश्य पूरी तरह अनुशासित और सराहनीय रही।
विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक सूझबूझ की भूरि-भूरि प्रशंसा होनी चाहिए। वहां तो इस बार ऐतिहासिक और अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिला। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के कुशल नेतृत्व में प्रशासन ने लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी परंपरा को बदलते हुए, कोलकाता के व्यस्त रेड रोड के बजाय इस विशाल सामूहिक नमाज़ को ब्रिगेड परेड ग्राउंड (मैदान) में स्थानांतरित करवा दिया। इस अपार भूभाग ने लाखों की भीड़ को समाहित कर लिया, शहर के आम नागरिकों को आवागमन में तनिक भी असुविधा नहीं हुई।
असम में भी हिमंत बिस्वा सरमा के प्रखर नेतृत्व में राज्य प्रशासन ने हफ्तों पहले से ही मस्जिद कमेटियों के साथ समन्वय स्थापित कर यह सुनिश्चित किया कि प्रार्थनाएं केवल चहारदीवारी के भीतर ही सीमित रहें और नागरिक व्यवस्था बनी रहे।
वहीं, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा पूर्व-नियोजित ‘शिफ्ट सिस्टम’ (चरणबद्ध नमाज़) के कड़े पालन के कारण सड़कें पूरी तरह खाली रहीं।
अब प्रश्न यह उठता है कि इन प्रदेशों के प्रशासनिक दृष्टिकोण अथवा क्षमता में इतना व्यापक अंतर क्यों है?
इसका उत्तर इन नेताओं के राजनीतिक मूल चरित्र (DNA) में छिपा है।
राजस्थान के भजन लाल शर्मा और मध्य प्रदेश के डॉ. मोहन यादव जैसे आरएसएस से ‘पैराड्रॉप’ किए गए लोग संगठनवादी कार्यकर्ता हैं। संघ के बंद कमरों की कार्यप्रणाली और संगठनात्मक अनुशासन में पले-बढ़े इन नेताओं का पूरा प्रशिक्षण आम सहमति बनाने, आदेशों का पालन करने और किसी भी विवाद से बचने पर आधारित होता है। ये व्यवस्थापक हैं, दृढ़ प्रशासक नहीं, जन प्रतिनिधि एवं जननेता नहीं है।
अतः जब धरातल पर कानून-व्यवस्था लागू करने की बात आती है, तो ऐसा कमजोर नेतृत्व तुरंत कोई कठोर निर्णय लेने के बजाय संकोच एवं असमंजस की स्थिति में चले जाते है।
इसके विपरीत योगी आदित्यनाथ, हिमंत बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता अपनी दशकों पुरानी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के बल पर स्थापित जननेता हैं।
ये किसी की कृपा से राजनीति में नहीं आए हैं, बल्कि इन्होंने धरातल पर संघर्ष करके और अपार जनसमर्थन के दम पर अपना वर्चस्व स्थापित किया है। चूँकि इनके पास जनता का प्रत्यक्ष और प्रचंड जनादेश है, इसलिए ये कानून के क्रियान्वयन में तनिक भी संकोच या संशय नहीं दिखाते। इनका केवल आदेश चलता है और प्रशासनिक तंत्र उसका अक्षरशः पालन करता है।
कल के घटनाक्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि वैचारिक श्रेष्ठता का ढोल पीटना तब तक व्यर्थ है, जब तक उसे लागू करने के लिए प्रशासनिक दृढ़ता न हो।
जहाँ संघ पृष्ठभूमि के नव-नियुक्त नेता वास्तविक संकट के समय पंगु नज़र आए, वहीं दृढ़ इच्छाशक्ति वाले इन जननेताओं ने दिखा दिया कि राज्य को वास्तविक रूप से कैसे चलाया जाता है।
वाह योगी, वाह हेमंत विश्वशर्मा एवं वाह वाह शुवेंदू अधिकारी
चित्र- कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में संपन्न होती बकरीद की नमाज एवं उसी समय रेड रोड में सुगम रूप से चलते हुए ट्रैफिक का दृश्य।
साभार :- तरुण_बनर्जी फेसबुक वाल
