अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो की भारत यात्रा की टाइमिंग और साथ ही घटित घटनाक्रमों के पीछे कुछ ऐसे सवाल छिपे हैं जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देंगे।
आखिर अभी ही क्यों? इतने अचानक क्यों? दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े राजनीतिक / व्यावसायिक केंद्रों को छोड़कर पहली बार भारत आए अमेरिकी विदेश मंत्री का पहला पड़ाव आखिर कोलकाता ही क्यों?
यदि आप कड़ियों को जोड़ें, तो एक बहुत ही गहरा और चिंताजनक पैटर्न सामने आता है:
- अमेरिकी राजनयिक सीधे ममता बनर्जी से नहीं मिलते, क्योंकि वह चुनाव के तुरंत बाद राजनीतिक रूप से बहुत लाउड हो जाता। इसलिए, उनका पहला पड़ाव ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ बनता है।
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इस वीआईपी अमेरिकी दौरे के तुरंत बाद, मिशनरीज ऑफ चैरिटी के प्रतिनिधि सीधे ममता बनर्जी के आवास पर जाते हैं। जब कोई विदेशी ताकत सीधे मुख्य द्वार से नहीं आ सकती, तो ऐसे नेटवर्क के जरिए पिछले दरवाजे का इस्तेमाल किया जाता है।
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करारी चुनावी हार के बाद जो ममता बनर्जी दिनों से राजनीतिक रूप से सुप्त हो गई थीं, वह इस बैठक के अगले ही दिन अचानक लाइव टेलीकास्ट के जरिए बंगाल की जनता को संबोधित करने सामने आ जाती हैं।
अब ममता बनर्जी की वह तीखी चुनौती याद आती है: “अगर मुझे कोलकाता में सत्ता से बेदखल किया गया तो मैं दिल्ली की सरकार हिला दूंगी।”
आखिर एक नितांत क्षेत्रीय नेता में संवैधानिक और केंद्रीय अधिकारियों के खिलाफ ऐसा दुस्साहस कहां से आता है? सिर्फ स्थानीय राजनीतिक ताकत के बूते कोई देश की राजधानी को इस तरह की चुनौती नहीं देता। कोई अंतरराष्ट्रीय ताकत का साथ तो है।
इस गहरे खेल को समझने के लिए हमें हालिया इतिहास की तरफ देखना होगा। अमेरिका ने हाल ही में बांग्लादेश, म्यांमार में तख्तापलट और राजनीतिक अस्थिरता के दौरान जो भूमिका निभाई, वह किसी से छिपी नही।
यह चैरिटी नेटवर्क सिर्फ कोलकाता तक सीमित नहीं हैं। यह बात जगजाहिर है कि यह पूरा बेल्ट झारखंड और पूरे North East में चलने वाले बड़े धर्मांतरण के खेल का एक बड़ा गेटवे रहा है। मणिपुर में हिंदुओं और ईसाइयों के टकराव को अभी भी कोई हल क्यों नहीं निकल पा रहा है। निश्चित ही इस खतरनाक नेटवर्क का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों को साधने के लिए किया जा रहा है।
जब आप इन सभी बिंदुओं को मिलाते हैं—अमेरिकी राजनयिकों का अचानक राज्य की राजधानी पहुंचना, बांग्लादेश में अमेरिका का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड, मतांतरण नेटवर्क के तार और हार के बाद भी एक नेता का ऐसा आक्रामक रूप—तो सीआईए और डीप स्टेट जैसे बाहरी संगठनों की परछाई को नजरअंदाज करना नामुमकिन हो जाता है।
यहां तक कि जो सादगी की प्रतीक मानी जाने वाली सफेद और नीली बॉर्डर वाली साड़ी थी, वह भी अब एक गहरी साजिश का संदेह पैदा करने लगी है।
साफ है कि बंगाल सिर्फ एक राज्य की राजनीति का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह विदेशी ताकतों का geopolitical अखाड़ा बन चुका था।
अब बड़ा सवाल यह है कि डीप स्टेट के असली दांव पर क्या लगा है, और असली रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में है? बंगाल और नॉर्थ ईस्ट में आने वाले समय के घटनाक्रम को देखना दिलचस्प होगा।
साभार :- तरुण बनर्जी का फेसबुक वाल
